Original text by Jagadguru Sri Adi Sankaracharya · Music & commentary by Hari Kavi (B Harikrishna)
श्लोक 5 - देवनागरी
यावद्वित्तोपार्जनसक्तस्
तावन्निज परिवारो रक्तः।
पश्चाज्जीवति जर्जर देहे
वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे॥ ५॥
5 में से 1
नेविगेट करने के लिए तीर का उपयोग करें

Subscribe for new verses
