Original text by Jagadguru Sri Adi Sankaracharya · Music & commentary by Hari Kavi (B Harikrishna)
श्लोक 21 - देवनागरी
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं
पुनरपि जननी जठरे शयनम्।
इह संसारे बहुदुस्तारे
कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥ २१॥
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