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भज गोविन्दम् – श्लोक 3 | Bhaja Govindam (Hindi)
Hari Kavi Explains

भज गोविन्दम् – श्लोक 3 | Bhaja Govindam (Hindi)

October 30, 2026 · 8 min

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भज गोविन्दम् – श्लोक 3 | बाहरी सुंदरता और वास्तविक ज्ञान

मनुष्य का मन बाहरी सुंदरता की ओर इतना आकर्षित क्यों होता है? और इस बाहरी रूप के पीछे छिपी वास्तविकता क्या है?

हरि कवि समझाते हैं – भज गोविन्दम् के इस एपिसोड में हम जगद्गुरु श्री आदि शंकराचार्य द्वारा रचित भज गोविन्दम् के तीसरे श्लोक पर विचार करेंगे।

इस श्लोक में आचार्य हमें शारीरिक आकर्षण और बाहरी सुंदरता के मोह से आगे बढ़कर जीवन की वास्तविकता को समझने की प्रेरणा देते हैं।

उनका उद्देश्य सुंदरता का विरोध करना या मानव शरीर का अनादर करना नहीं है। वे हमें याद दिलाते हैं कि शरीर, यौवन और बाहरी आकर्षण समय के साथ बदलते रहते हैं। इसलिए केवल बाहरी रूप से प्रभावित होने के बजाय हमें विवेक विकसित करना चाहिए और उन गुणों को पहचानना चाहिए जो जीवन को वास्तव में मूल्यवान बनाते हैं।

इस एपिसोड की शुरुआत मूल संस्कृत श्लोक से होती है। इसके बाद हम उसके अर्थ, दार्शनिक संदेश और आज के जीवन में उसकी प्रासंगिकता को सरल और आत्मीय हिन्दी में समझने का प्रयास करेंगे।

इस एपिसोड में:

- मूल संस्कृत श्लोक का पाठ

- तीसरे श्लोक का अर्थ और उस पर चिंतन

- बाहरी सुंदरता और शरीर की नश्वरता को समझना

- आधुनिक जीवन के लिए व्यावहारिक विचार

व्याख्या एवं प्रस्तुति: Hari Kavi

प्रकाशक: Shikshak Digital Publishing

हरि कवि द्वारा स्वरबद्ध भज गोविन्दम् – श्लोक 3 की पूरी संगीत रचना सुनें:

https://youtu.be/o-cG29KIeWw

अधिक जानकारी:

https://shikshakdp.com