Original text by Jagadguru Sri Adi Sankaracharya · Music & commentary by Hari Kavi (B Harikrishna)
श्लोक 18 - देवनागरी
सुरमन्दिरतरुमूलनिवासः
शय्या भूतलमजिनं वासः।
सर्वपरिग्रहभोगत्यागः
कस्य सुखं न करोति विरागः॥ १८॥
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